अध्याय का नाम: आखेट-खाद्य संग्रह से भोजन उत्पादन तक (Short Notes)

1. आरंभिक मानव और आखेटक-खाद्य संग्राहक
- समय: आज से लगभग 20 लाख साल पहले इस उपमहाद्वीप में रहने वाले लोग।
- नामकरण: इन्हें भोजन का इंतज़ाम करने की विधि के आधार पर ‘आखेटक-खाद्य संग्राहक’ (Hunter-Gatherers) कहा जाता था।
- भोजन का स्रोत: जंगली जानवरों का शिकार, मछलियाँ-चिड़ियाँ पकड़ना, फल-मूल, दाने, पौधे, पत्तियाँ और अंडे इकट्ठा करना।
- इधर-उधर घूमने (खानाबदोश होने) के 4 मुख्य कारण:
-
- संसाधनों की समाप्ति: एक जगह रहने से वहाँ के फल-फूल और जानवर समाप्त हो जाते थे।
- जानवरों का पीछा करना: शिकार (जैसे हिरण और मवेशी) चारे की तलाश में घूमते थे, इसलिए शिकारी भी उनके पीछे-पीछे जाते थे।
- मौसमी फल-फूल: अलग-अलग पौधों पर फल-फूल अलग-अलग मौसम में आते थे।
- पानी की आवश्यकता: सूखी ऋतुओं में पानी वाली झीलों और नदियों की तलाश में यात्रा करनी पड़ती थी।
- यातायात का इतिहास: रेल यात्रा की शुरुआत लगभग 150 साल पहले हुई थी, उसके कुछ दशक बाद बस आई।
2. आरंभिक मानव के बारे में जानकारी (औज़ार और उपयोग)
- पुरातत्वविदों को उनके द्वारा बनाए और इस्तेमाल किए गए पत्थरों, लकड़ियों और हड्डियों के औज़ार मिले हैं।
- औज़ारों के प्रमुख उपयोग:
- फल-फूल काटना, हड्डियाँ और मांस काटना।
- पेड़ों की छाल और जानवरों की खाल उतारना।
- हड्डियों या लकड़ियों के मुट्ठे लगाकर भाले और बाण जैसे हथियार बनाना।
- लकड़ियाँ काटना (ईंधन और झोपड़ियाँ/औज़ार बनाने के लिए)।
- बाएँ चित्र का महत्व: पत्थर से जमीन खोदकर खाने योग्य जड़ें निकालना।
- दाएँ चित्र का महत्व: सिलने के लिए जानवरों की खाल से वस्त्र बनाना।
3. रहने की जगह और महत्वपूर्ण पुरास्थल
- उद्योग-स्थल (Factory Sites): वे स्थान जहाँ लोग पत्थरों से औज़ार बनाते थे।
- आवासीय और उद्योग-स्थल (Habitation-cum-Factory Sites): जहाँ लोग औज़ार बनाने के साथ-साथ लंबे समय तक रहा भी करते थे।
- भीमबेटका (आधुनिक मध्य प्रदेश): यह एक आवासीय पुरास्थल है। यहाँ आदिमानव गुफाओं और कंदराओं में रहते थे क्योंकि यहाँ उन्हें बारिश, धूप और हवाओं से राहत मिलती थी। ये गुफाएँ नर्मदा घाटी के पास हैं।
- शैल चित्रकला: गुफाओं की दीवारों पर बने चित्र। सुंदर उदाहरण मध्य प्रदेश और दक्षिणी उत्तर प्रदेश की गुफाओं से मिलते हैं, जिनमें जंगली जानवरों का सजीव चित्रण है।
- पुरास्थल (Sites) क्या हैं?: उस स्थान को कहते हैं जहाँ औज़ार, बर्तन और इमारतों जैसी वस्तुओं के अवशेष मिलते हैं। ये ज़मीन के ऊपर, अंदर या कभी-कभी समुद्र और नदी के तल में भी पाए जाते हैं।
4. आग की खोज
- कुर्नूल गुफा (आंध्र प्रदेश): यहाँ से राख के अवशेष मिले हैं।
- महत्व: इसका मतलब आरंभिक लोग आग जलाना सीख गए थे।
- आग का उपयोग: प्रकाश के लिए, मांस भूनने के लिए और खतरनाक जानवरों को दूर भगाने के लिए किया जाता था।
5. इतिहास के नाम और तिथियाँ (सबसे महत्वपूर्ण सेक्शन)
पुरातत्वविदों ने काल को तीन मुख्य भागों में बाँटा है:
| काल का नाम | समयावधि (Time Period) | मुख्य विशेषता |
|---|---|---|
| पुरापाषाण काल (Palaeolithic) | 20 लाख साल पहले से 12,000 साल पहले तक | ‘पुरा’ यानी प्राचीन, ‘पाषाण’ यानी पत्थर। मानव इतिहास की 99% कहानी इसी काल में घटी। इसे भी तीन भागों में बाँटा गया है: आरंभिक, मध्य और उत्तर पुरापाषाण काल। |
| मध्यपाषाण काल (Mesolithic) | 12,000 साल पहले से 10,000 साल पहले तक | इस काल में पर्यावरणीय बदलाव आए। इस काल के पत्थर के औज़ार बहुत छोटे होते थे, जिन्हें ‘माइक्रोलिथ’ (Microlith) या लघुपाषाण कहा जाता है। इनमें हड्डियों या लकड़ियों के मुट्ठे लगे हँसिए और आरी जैसे औज़ार मिलते हैं। |
| नवपाषाण काल (Neolithic) | 10,000 साल पहले से शुरू | इसकी शुरुआत लगभग 10,000 साल पहले हुई। नए युग के औज़ार और कृषि युग। |
6. बदलती जलवायु, खेती और पशुपालन की शुरुआत
- जलवायु परिवर्तन: लगभग 12,000 साल पहले दुनिया की जलवायु में बड़ा बदलाव आया और गर्मी बढ़ने लगी।
- परिणाम: घास वाले मैदान बनने लगे। हिरण, बारहसिंघा, भेड़, बकरी और गाय जैसे शाकाहारी जानवरों की संख्या बढ़ी।
- खेती की शुरुआत: इसी दौरान उपमहाद्वीप में गेहूँ, जौ और धान जैसे अनाज प्राकृतिक रूप से उगने लगे। लोगों (पुरुषों, महिलाओं और बच्चों) ने इन्हें इकट्ठा करना सीखा, समझा कि ये कब पकते हैं और खुद अनाज उगाना सीखकर ‘कृषक’ (Farmers) बन गए।
- पशुपालन की शुरुआत: लोगों ने अपने घरों के आसपास चारा रखकर जानवरों को आकर्षित कर पालतू बनाया।
- सबसे पहले जिस जानवर को पालतू बनाया गया वह कुत्ते का जंगली पूर्वज था।
- बाद में लोगों ने भेड़, बकरी, गाय और सूअर जैसे झुंड में रहने वाले जानवरों को पालतू बनाया। इस तरह वे ‘पशुपालक’ (Herders) बने।
7. ‘बसने की प्रक्रिया’ (Domestication)
- परिभाषा: लोगों द्वारा पौधे उगाने और जानवरों की देखभाल करने को ‘बसने की प्रक्रिया’ का नाम दिया गया है।
- शुरुआत: यह प्रक्रिया पूरी दुनिया में लगभग 12,000 साल पहले शुरू हुई।
- विशेषता (चयन): लोग उन्हीं पौधों और जानवरों का चयन करते थे:
- जिनके बीमार होने की संभावना कम हो।
- जिनसे बड़े दाने वाले अनाज पैदा हों और जिनकी मजबूत डंठलें पके दानों के भार को संभाल सकें।
- जानवरों में जो अहिंसक स्वभाव के हों।
- बदलाव: पालतू जानवरों के दाँत और सींग जंगली जानवरों की तुलना में बहुत छोटे होते हैं।
- मुख्य बिंदु: आज हम जो भोजन करते हैं, वह इसी बसने की प्रक्रिया की वजह से है। सबसे प्राचीन फसलों में गेहूँ तथा जौ आते हैं और सबसे पहले पालतू बनाए गए जानवरों में भेड़-बकरी आते हैं।
8. एक नवीन जीवन-शैली और अनाज के उपयोग
- स्थायी निवास: बीज बोने से लेकर फसल पकने, सिंचाई करने, खरपतवार हटाने और जानवरों से सुरक्षा के लिए लोगों को एक जगह पर लंबे समय तक रहना पड़ता था।
- भंडारण की आवश्यकता: भोजन और बीज दोनों के रूप में अनाज को बचाकर रखना आवश्यक था। इसलिए लोगों ने:
- मिट्टी के बड़े-बड़े बर्तन बनाए।
- टोनियां (टोकरियाँ) बुनीं।
- या फिर ज़मीन में गड्ढे खोदे।
- अनाज के 4 मुख्य उपयोग:
- बीज के रूप में (As seed)
- खाद्य के रूप में (As food)
- उपहार के रूप में (As gift)
- भंडारण के लिए (Stored for food)
- पशु: चलते-फिरते ‘खाद्य-भंडार’: जानवर बच्चे देते हैं जिससे उनकी संख्या बढ़ती है। उनसे दूध और मांस मिलता है जो भोजन का एक अच्छा स्रोत है। इसलिए पशुपालन एक तरह से भोजन के भंडारण का तरीका था।
9. आरंभिक कृषकों और पशुपालकों के साक्ष्य
- पुरातत्वविदों को पूरे उपमहाद्वीप में शुरुआती कृषकों और पशुपालकों के होने के साक्ष्य मिले हैं।
- महत्वपूर्ण क्षेत्र: उत्तर-पश्चिम (आधुनिक कश्मीर में), पूर्वी और दक्षिणी भारत में।
- पहचान का तरीका: वैज्ञानिक जली हुई लकड़ियों और अनाज के दानों के अवशेषों की पहचान करते हैं। यहाँ से विभिन्न फसलों और जानवरों की हड्डियों के नमूने मिले हैं।
10. स्थायी जीवन की ओर (मेहरगढ़ और बुर्जहोम)
- बुर्जहोम (वर्तमान कश्मीर में):
- यहाँ के लोग गड्ढे के नीचे घर बनाते थे, जिन्हें ‘गर्तवास’ (Pit-house) कहा जाता है। इसमें उतरने के लिए सीढ़ियाँ होती थीं।
- गर्तवास उन्हें ठंड के मौसम में सुरक्षा देते थे।
- झोपड़ियों के अंदर और बाहर दोनों जगहों पर आग जलाने की जगहें मिली हैं, जिससे पता चलता है कि लोग मौसम के अनुसार घर के अंदर या बाहर खाना पकाते थे।
- नवपाषाण युग के औज़ार (पुरापाषाण से भिन्न):
- इन औज़ारों की धार को अधिक पैना करने के लिए उन पर पॉलिश चढ़ाई जाती थी।
- अनाज और अन्य वनस्पतियों को पीसने के लिए ओखली और मूसल का प्रयोग किया जाता था (आज हज़ारों साल बाद भी ओखली-मूसल का उपयोग होता है)।
- कुछ औज़ार हड्डियों से भी बनाए जाते थे।
- मिट्टी के बर्तन: नवपाषाण युग में मिट्टी के बर्तनों पर अलंकरण (डिजाइन/चित्रकारी) भी किया जाता था। इनका उपयोग चीजें रखने और धीरे-धीरे चावल, गेहूँ तथा दलहन जैसे अनाज पकाने के लिए होने लगा।
- कपड़े बुनना: इस काल में लोगों ने कपास जैसे आवश्यक पौधे उगाकर कपड़े बुनना भी शुरू कर दिया था।
11. सूक्ष्म निरीक्षण 1: मेहरगढ़ में जीवन-मृत्यु
- स्थिति: यह ईरान जाने वाले सबसे महत्वपूर्ण रास्ते, बोलन दर्रे के पास एक हरा-भरा समतल स्थान है (वर्तमान पाकिस्तान में)।
- ऐतिहासिक महत्व: मेहरगढ़ वह स्थान है जहाँ के स्त्री-पुरुषों ने इस इलाके में सबसे पहले जौ, गेहूँ उगाना और भेड़-बकरी पालना सीखा।
- घर की बनावट: यहाँ चौकोर तथा आयताकार घरों के अवशेष मिले हैं। प्रत्येक घर में चार या उससे ज़्यादा कमरे होते थे, जिनमें से कुछ का उपयोग भंडारण (अनाज रखने) के लिए होता होगा।
- मृत्यु और कब्रें: मेहरगढ़ के लोगों का मानना था कि मृत्यु के बाद भी जीवन होता है।
- कब्रों में मृतकों के साथ कुछ सामान भी रखे जाते थे।
- विशेष साक्ष्य: एक कब्र में एक मृतक के साथ एक बकरी को भी दफनाया गया था। माना जाता था कि इसे परलोक में मृतक के खाने के लिए रखा गया होगा।
12. सूक्ष्म निरीक्षण 2: अन्य महत्वपूर्ण स्थल (चित्रों और बक्सों की जानकारी)
क) फ्रांस में गुफा में की गई चित्रकारी (विश्व इतिहास)
- खोज: फ्रांस के एक पुरास्थल की खोज लगभग 100 साल पहले चार स्कूली छात्रों ने की थी।
- समय: ये चित्र लगभग 20,000 साल पहले से लेकर 10,000 साल पहले के बीच बनाए गए होंगे।
- चित्रों के विषय: इनमें जंगली घोड़े, गाय, भैंस, गैंडा, रेंडीयर, बारहसिंघा और सूअरों के चमकीले चित्र हैं।
- रंग: इन चित्रों को लौह-अयस्क और चारकोल जैसे खनिज पदार्थों से बनाया जाता था।
- उद्देश्य: संभवतः इन्हें उत्सवों या शिकारियों द्वारा शिकार पर निकलने से पहले अनुष्ठानों के लिए बनाया जाता था।
ख) एक नवपाषाणिक पुरास्थल: चताल हयुक (तुर्की)
- स्थिति: तुर्की में स्थित यह नवपाषाण काल के सबसे प्रसिद्ध पुरास्थलों में से एक है।
- विशेषता: यहाँ दूर-दराज के स्थानों से कई चीजें लाई जाती थीं और उनका उपयोग किया जाता था:
- सीरिया से लाया गया चकमक पत्थर।
- लाल सागर की कौड़ियाँ।
- भूमध्य सागर की सीपियाँ।
- ध्यान देने योग्य बात: उस समय पहिए वाले वाहन नहीं थे, लोग सामान खुद अपनी पीठ पर या जानवरों की पीठ पर लादकर लाते थे।
📅 कुछ महत्वपूर्ण तिथियाँ (सीधे परीक्षा में पूछी जाती हैं):
- मध्यपाषाण युग: 12,000 वर्ष पूर्व से लेकर 10,000 वर्ष पूर्व तक।
- बसने की प्रक्रिया का आरंभ: लगभग 12,000 वर्ष पूर्व।
- नवपाषाण युग का आरंभ: लगभग 10,000 वर्ष पूर्व।
- मेहरगढ़ में बस्ती का आरंभ: लगभग 8,000 वर्ष पूर्व।
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